गुरुवार 13 अगस्त 2026 - 17:32
आयत-ए-मुबाहला के बारे में मामून की शंका और इमाम रज़ा (अ) का जवाब

हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन उस्ताद नज़री मुनफ़रिद ने अपने भाषण में आयत-ए-मुबाहला के बारे में इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम और मामून के बीच हुई बहस का उल्लेख किया। मामून "अंफुसना" शब्द के अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम के लिए इस्तेमाल होने का अर्थ नकारने की कोशिश कर रहा था। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने "बुलाने वाले" और "बुलाए गए व्यक्ति" के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए इस शंका का जवाब दिया।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन उस्ताद नज़री मुनफ़रिद ने अपने भाषण में आयत-ए-मुबाहला के बारे में मामून और इमाम रज़ा (अ) के बीच हुई बहस का उल्लेख किया है।

मामून ने हज़रत इमाम रज़ा (अ) से कहा: "मुबारक आयत-ए-मुबाहला में 'अंफुसना' का अमीरुल मोमिनीन (अ) से बिल्कुल कोई संबंध नहीं है।" मामून का दावा था कि इस आयत का अमीरुल मोमिनीन (अ) से कोई संबंध नहीं है। इमाम (अ) ने उससे पूछा: "तुम ऐसा कैसे समझते हो?"

मामून ने जवाब दिया: "अल्लाह इस आयत में फ़रमाता है: 'نَدْعُ أَبْنَاءَنَا وَأَبْنَاءَکُمْ وَنِسَاءَنَا وَنِسَاءَکُمْ وَأَنْفُسَنَا وَأَنْفُسَکُمْ नद्ऊ अब्नाअना व अब्नाअकुम व निसाअना व निसाअकुम व अंफुसना व अंफुसकुम'; अर्थात पैग़म्बर को आदेश दिया गया है कि वे अपने बेटों और अपनी औरतों को बुलाएँ और अंत में स्वयं को भी उपस्थित करें। इसलिए 'अंफुसना' से स्वयं पैग़म्बर ही अभिप्रेत हैं।"

इमाम रज़ा (अ) ने जवाब दिया: "नहीं, 'अंफुसना' से अमीरुल मोमिनीन अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम अभिप्रेत हैं।"

मामून ने पूछा: "कैसे?"

इमाम (अ) ने दलील देते हुए फ़रमाया: "अल्लाह फ़रमाता है: 'नद्ऊ अब्नाअना व अब्नाअकुम' अर्थात कहो कि हम अपने बेटों और तुम्हारे बेटों तथा अपनी औरतों और तुम्हारी औरतों को बुलाएँ। यहाँ 'दाई' अर्थात बुलाने वाले रसूल-ए-ख़ुदा (स) हैं और 'मदऊ' अर्थात बुलाए गए लोग उनके बेटे और औरतें हैं। क्या बुलाने वाला और बुलाया गया व्यक्ति एक ही हो सकते हैं? निश्चित रूप से नहीं।

अब यदि 'व अंफुसना व अंफुसकुम' के बारे में भी हम यह कहें कि पैग़म्बर (स) स्वयं को ही बुला रहे थे, तो यह बात तर्कहीन और हास्यास्पद होगी, क्योंकि 'दाई' अर्थात बुलाने वाला व्यक्ति स्वयं के अलावा किसी दूसरे व्यक्ति को बुलाता है।

इसलिए आवश्यक है कि कोई ऐसा व्यक्ति हो जो पद और कमाल में रसूल-ए-ख़ुदा (स) के समान हो, ताकि उसे 'पैग़म्बर की जान' या 'नफ़्स' कहा जा सके। और वह व्यक्ति अमीरुल मोमिनीन अली इब्ने अबी तालिब (अ) के अलावा कोई दूसरा नहीं है।"

इस मज़बूत और तर्कपूर्ण दलील को सुनकर मामून ने इमाम (अ) की दलील की श्रेष्ठता को स्वीकार कर लिया।

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